Friday, 24 October 2014

आतंकवाद




आतंक का कारोबार
03-09-14

इराक और सीरिया के कुछ हिस्सों पर कब्जा जमाए हुए आतंकवादी संगठन आईएसआईएस ने एक और अमेरिकी पत्रकार स्टीवन सॉटलॉफ का सिर काटकर इस हत्या का वीडियो जारी कर दिया है। दो हफ्ते पहले इन्हीं आतंकवादियों ने एक अमेरिकी पत्रकार जेम्स फॉली का भी सिर काट दिया था। फॉली का सिर काटने का जो वीडियो जारी हुआ था, उसमें सॉटलॉफ भी दिख रहे थे, इस तरह आतंकवादी एक तरह से धमकी दे रहे थे कि अगर अमेरिका ने उनसे सौदेबाजी नहीं की और उन पर हमले जारी रखे, तो सॉटलॉफ की भी हत्या कर दी जाएगी। अमेरिका ने आतंकवादियों से समझौता करने से इनकार कर दिया और नतीजे में सॉटलॉफ की भी हत्या कर दी गई। इस तरह हत्या करके उसका प्रचार करना आतंकवादियों की पुरानी रणनीति है। इससे दुनिया भर में उनकी चर्चा होती है और यह प्रचार वास्तव में आतंकवाद की असली खुराक है। प्रचार के लिए आतंकवादी नए-नए वीभत्स और अमानवीय तरीके ढूंढ़ते रहते हैं। इस तरह की हत्या   से उनका एक और मकसद पूरा हो जाता है। फिरौती वसूलना इस वक्त आतंकवादी संगठनों की आय का सबसे बड़ा साधन है। फिरौती वसूलने के लिए सबसे आसान और फायदेमंद तरीका किसी समृद्ध देश के नागरिकों को बंधक बनाना है। अमेरिका आतंकवादियों से अमूमन सौदेबाजी नहीं करता, इसलिए उसके दो पत्रकार मारे गए, लेकिन इससे कुछ डर तो पैदा हो ही जाएगा। अमेरिकियों की शिकायत यह है कि यूरोपीय देश अक्सर आतंकवादियों की धमकी में आ जाते हैं। यूरोपीय देशों की घोषित नीति तो आतंकवादियों से किसी तरह की सौदेबाजी नहीं करने की है, लेकिन वे अमूमन अपने नागरिकों की रिहाई के लिए पैसा दे देते हैं। जाहिर है, फिरौती देकर नागरिकों को छुड़ाने से यह कारोबार कम नहीं होता, बल्कि बढ़ता चला जाता है। अमेरिका और पश्चिमी एशिया के कई आतंकवादी संगठन अब ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लिए फिरौती वसूलने के धंधे में लग गए हैं। पहले आतंकवादी संगठनों को उनकी समर्थक सरकारें या व्यक्तियों से काफी पैसा मिल जाता था, पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निगरानी सख्त होने से वह पैसा काफी घट गया है और उसकी जगह फिरौती के धंधे ने ले ली है। अनुमान यह लगाया जाता है कि पिछले पांच-छह साल में अल-कायदा या उससे जुड़े संगठनों ने यूरोपीय सरकारों से कम से कम 600-650 करोड़ रुपये वसूले हैं, इसमें से लगभग आधी रकम तो आतंकवादियों ने पिछले एक साल में कमाई है। आतंकवादियों के कब्जे में जो लोग होते हैं, उनके बारे में और उनके परिजनों के बारे में मीडिया में जैसी दर्दनाक खबरों का तांता लग जाता है, उसके मद्देनजर लोकतांत्रिक सरकारें इस मामले में कड़ा फैसला करने की हिम्मत नहीं करतीं, क्योंकि इससे उनकी लोकप्रियता घट सकती है। पश्चिम एशिया के कई देश हैं, जो आतंकवादियों और सरकारों के बीच मध्यस्थ का काम करते हैं या कई देश हैं, जो आतंकवादियों को सीधी मदद न भी करते हों, पर उनके प्रति नरम हैं। दिक्कत यह है कि ये देश पश्चिम के मित्र देश हैं, इसलिए अमेरिकी या यूरोपीय उनके खिलाफ सख्त नहीं हो पा रहे हैं। पश्चिम की एक बड़ी चिंता यह भी है कि उनके देशों के कई हजार नागरिक सीरिया और इराक में आतंकवादियों में शामिल हो गए हैं। इनका इस्तेमाल आतंकवादी संगठन प्रचार और सौदेबाजी के लिए करते हैं। पत्रकारों की हत्या में जो शामिल थे, वे अंग्रेजी बोलने वाले संभवत: इंग्लैंड से गए आतंकवादी थे। अगर दुनिया ने आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर सख्त रवैया न अपनाया, तो ऐसी घटनाएं और हो सकती हैं।
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अलकायदा की आहट
Sat, 06 Sep 2014 

आइएस के आतंक के बाद अलकायदा की धमकी को भारत के लिए बेहद गंभीर मान रहे हैं प्रकाश सिंह
दक्षिण एशिया का सुरक्षा परिदृश्य दिनोंदिन भयावह होता जा रहा है। अफगानिस्तान छिन्न-भिन्न हो चुका है। पाकिस्तान भी विनाश की कगार पर दिखता है। अस्थिरता एवं अशांति की लहरें भारत की सीमा पर भी थपेड़े ले रही हैं। पिछले कुछ महीनों से इस्लामिक स्टेट (आइएस) की बर्बरता और उसके मध्य-पूर्व एशिया में बढ़ते हुए प्रभाव से सारे विश्व में चिंता हो रही है। अल बगदादी के खलीफा बनने के बाद इस्लामिक स्टेट के सैनिकों ने अपने विरोधियों और अल्पसंख्यकों पर जो कहर ढाया वह हमें मध्यकालीन युग की याद दिलाता है। अमेरिका के रक्षामंत्री चक हेगेल के अनुसार आइएस जैसा कोई संगठन उन्होंने अभी तक नहीं देखा था, जिसमें विचारधारा और सैन्य शक्ति का ऐसा खतरनाक संगम हो। आइएस ने अमेरिका को खुलेआम धमकी दी है कि वह उसे खून से नहला देगा। एक अन्य सूचना के अनुसार आइएस समर्थक ब्रिटेन में मुंबई में हुए 26 नवंबर जैसे हमलों को अंजाम देना चाहते हैं। कहा जाता है कि खलीफा वर्तमान में ब्रिटेन के बराबर भौगोलिक क्षेत्र में अपना साम्राज्य स्थापित कर चुका है। ऐसा नहीं है कि आइएस का प्रभाव इराक, सीरिया और लगे हुए मध्य पूर्व देशों तक ही सीमित रहेगा। आधिकारिक सूचना के अनुसार आइएस की पाकिस्तान में घुसपैठ हो चुकी है। पेशावर और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में आइएस समर्थकों में अपना प्रोपोगैंडा अथवा प्रचार साहित्य वितरित किया है। इसमें आइएस ने अपने आपको 'दौलते इस्लामिया' के रूप में प्रस्तुत किया है और लोगों से खलीफा के समर्थन में जेहाद छेड़ने की अपील की है। ऐसा भी सुनने में आया है कि कई कट्टरपंथी संगठनों ने आइएस के प्रति अपनी निष्ठा का एलान कर दिया है। भारत में भी आइएस का प्रभाव परिलक्षित होने लगा है, भले ही वह छोटे पैमाने पर है। वैसे भी हम 11 जुलाई को और बाद में ईद के दिन 29 जुलाई को कश्मीर में कुछ युवाओं को आइएस के झंडे फहराते देखे चुके हैं। कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि आइएस समर्थक गतिविधियां निकट भविष्य में अन्य क्षेत्रों में भी देखी जाएं। एक तरफ तो इस्लामिक स्टेट का जहर फैल रहा है और दूसरी तरफ अलकायदा भी फुफकार मारने लगा है। इसके नेता अल जवाहिरी ने एक वीडियो जारी किया है जिसमें उन्होंने अलकायदा की भारतीय शाखा 'कायदात अल जेहाद' की स्थापना का एलान किया है। वीडियो में अल जवाहिरी ने कहा है कि भारत मुस्लिम साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था, यहां फिर से इस्लामिक राज्य स्थापित किया जाएगा। उसने यह भी कहा कि अल कायदा ब्रिटिश साम्राज्य के समय खींची गई कृत्रिम सीमाओं को, जो मुसलमानों को अलग-अलग देशों में बांटती है, ध्वस्त कर देगा। जवाहिरी शायद ऐसा कहते समय भूल गया कि ऐसी सीमाओं में डूरंड लाइन भी है और इसके ध्वस्त करने का मतलब पाकिस्तान का विघटन होगा। सवाल यह उठता है कि अल जवाहिरी के वीडियो जारी करने के पीछे क्या मंशा च्च्ी? सच्चाई यह है कि जबसे इस्लामिक स्टेट चर्चा में आया है तब से अलकायदा की उग्र छवि धीरे-धीरे धूमिल हो रही थी। कई देशों के इस्लामिक संगठन, जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया और पाकिस्तान के भी कुछ संगठन, जो अभी तक अलकायदा से संबद्ध थे, वे धीरे-धीरे आइएस की ओर झुकने लगे थे। इन परिस्थितियों में अपने महत्व को बनाए रखने के लिए संभवत: अलकायदा ने यह पैंतरा चला है। भारत, बांग्लादेश और म्यांमार, इन तीनों ही देशों में मुसलमानोंच्की अच्छी खासी आबादी है। अल जवाहिरी का लक्ष्य इन लोगों में धार्मिक उन्माद बढ़ाकर अलकायदा को प्रासंगिक बनाए रखना प्रतीत होता है। वीडियो में उसने साफ-साफ कहा है कि सारी दुनिया के मुसलमानों में नई चेतना का संचार हो रहा है तो दक्षिण एशिया के मुसलमान कैसे शांत रह सकते हैं। 'इस समुद्र में कोई तूफान क्यों नहीं है'।
भारत सरकार ने अलकायदा के वीडियो को गंभीरता से लिया है। सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया गया है। राज्यों को अलर्ट भेज दिया गया है। इसमें संदेह नहीं कि वीडियो के संदेश को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। वास्तव में आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण की तात्कालिक आवश्यकता है। वर्तमान व्यवस्था लगभग वही है जो पूर्व सरकार के समय में थी। राजग सरकार ने कई दिशा में प्रगति के कदम लिए हैं। संसद ने महत्वपूर्ण बिल पारित किए। सरकारी दफ्तरों में एक नई कार्यशैली दिख रही है। अर्थव्यवस्था भी सुधार की दिशा में है। दुर्भाग्य से आंतरिक सुरक्षा का क्षेत्र ही ऐसा है जहां कोई नए ठोस कदम नहीं दिख रहे हैं। ऐसे तो सारी सुरक्षा व्यवस्था के पुनरीक्षण की आवश्यकता है, परंतु विशेष तौर से आतंकवाद से निपटने का हमारा जो ढांचा है उसे सशक्त बनाने की जरूरत है। इसके लिए तीन मुद्दों पर तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए। पहला तो यह कि हम आतंकवाद से निपटने की अपनी नीति की सुस्पष्ट व्याख्या कर दें। पिछले छह दशकों में हमारे नेतृत्व ने दुर्भाग्य से इस दिशा में ध्यान नहीं दिया। जो सरकार आती है, अपने राजनीतिक आकलन के अनुसार नीति बनाती और चलाती है। दूसरा यह कि आतंकवाद निरोधक कानून और सख्त बनाने की जरूरत है। जहां-तहां राष्ट्रविरोधी प्रदर्शन व अन्य गतिविधियां होती रहती हैं और हम उन्हें बर्दाश्त करते रहते हैं। अंग्रेजी में कहा जाता है कि 'एनफ इज एनफ' यानी बहुत हो गया। बर्दाश्त की सीमा होती है। लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए दुरुपयोग बंद होना चाहिए। देश की एकता और संप्रभुता को चुनौती देने वाले को सीधे-सीधे एक निर्धारित अवधि के लिए अंदर कर दिया जाना चाहिए। तीसरा यह कि नेशनल काउंटर टेररिज्म की स्थापना विवादों को सुलझाते हुए अविलंब की जानी चाहिए। इसी क्रम में राष्ट्रीय स्तर पर एक काउंटर टेररिज्म एकेडमी भी बनाई जानी चाहिए, जहां सशस्त्र पुलिस बलों को आतंकवाद से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाए। हमें अपनी पश्चिमी सीमाओं को भी और सुदृढ़ करना होगा। जब-तब घुसपैठ की सूचनाएं आती रहती हैं। अफगानिस्तान से जैसे-जैसे नाटो की फौजें हटती जाएंगी हमारी सीमाओं पर दबाव बढ़ता जाएगा। भारत सरकार को 'आउट ऑफ बॉक्स' सोचना पड़ेगा। बांग्लादेश की सीमा पर वर्तमान में बीएसएफ यानी सीमा सुरक्षा बल तैनात है, परंतु इसे गैर-घातक (नॉन लीथल) हथियार दे दिए गए हैं। अगर शस्त्र का प्रभावी प्रयोग नहीं करना है तो सीमा की जिम्मेदारी किसी और सुरक्षा बल को दी जा सकती है। सीमा सुरक्षाबल की बटालियनें, जो इस प्रकार उपलब्ध होती हैं, उन्हें भी पश्चिमी सीमा पर लगाया जा सकता है। आइएस और अलकायदा के संदेश को हमें गंभीरता से लेना पड़ेगा। इस परिप्रेक्ष्य में सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करते हुए संभावित चुनौतियों से तैयार रहने का कोई विकल्प नहीं है।
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जिहादी विचारधारा के विषबीज

Thu, 11 Sep 2014 

अमेरिका पर हुए 9/11 आतंकी हमले की 13वीं वर्षगांठ आज हमें फिर उसी घटना का पूर्वानुभव कराती है। सितंबर 2001 में अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर स्थित ट्विन टॉवर पर आतंकी हमले की भयावहता और दुस्साहस को लेकर वाशिंगटन स्थित पेंटागन भी भौचक रह गया था। इस घटना ने अमेरिका को पूरी तरह हिला कर रख दिया और लोगों में डर और घबराहट फैल गई थी। उस समय तक अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति बहुत स्पष्ट नहीं थी या कहें इस तरह की प्रतिकूल चुनौतियों से निपटने को लेकर रणनीति का अभाव था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के नेतृत्व में व्हाइट हाउस को इस बारे में आक्रामक सैन्य जवाब देने की नीति बनाने में थोड़ा समय लगा। इसी रणनीति के तहत अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ कार्रवाई की गई और यहां तक की बमबारी भी की गई। अमेरिका ने अपनी इस कार्रवाई को आतंक के खिलाफ वैश्रि्वक युद्ध करार दिया और कहा कि उनकी रणनीति अलकायदा और उसके नेता ओसामा बिन लादेन का खात्मा करना है। बाद में ऐबटाबाद ऑपरेशन इसी का सफल नतीजा था। आज 13 वर्ष बाद व्हाइट हाउस में रह रहे राष्ट्रपति बराक ओबामा के सामने भी कुछ वैसी ही चुनौती है। अगस्त माह के अंत में आइएस या कहें इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड सीरिया नामक आतंकी संगठन ने जब एक अमेरिकी नागरिक का सिर कलम किए जाने का डराने वाला वीडियो जारी किया तो ओबामा हैरान रह गए। इस घटना के मद्देनजर उनकी पहली स्वीकारोक्ति यही थी कि इस तरह के संकट को लेकर व्हाइट हाउस के पास कोई रणनीति नहीं थी। एक अमेरिकी का सिर कलम किए जाने के बाद आइएस ने ऐसी ही दूसरी वीभत्स घटना को अंजाम दिया। कुल मिलाकर यह संगठन अलकायदा की तुलना में कहीं अधिक खतरनाक दिख रहा है। एक समय अमेरिका में जो लोग अफगानिस्तान से अमेरिकी सैन्य टुकड़ियों की वापसी को लेकर ओबामा के निर्णय की सराहना कर रहे थे अब वही लोग कड़ी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। अमेरिका नाटो के कुछ सहयोगियों के साथ मिलकर जवाबी कार्रवाई पर विचार कर सकता है, जिसमें क्षेत्रीय शक्तियां जैसे इराक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। 9/11 की घटना के बाद 13 वषरें के अंतराल में अन्य बहुत से लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा है, लेकिन देखने में यही आ रहा है कि अमेरिका के तमाम प्रयासों के बावजूद इस बात की गारंटी नहीं दी जा सकी है कि ट्विन टॉवर को ध्वस्त करने वाले अपराधियों और उन्हें प्रोत्साहित करने वाली विचारधारा को खत्म अथवा कमजोर कर दिया गया है। इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता के खिलाफ युद्ध छेड़ने की गलत सलाह और नीति के कारण विषैले सांप्रदायिक विभाजन के बीज बोये गए और आज वही बीज आइएस के रूप में हमारे सामने है। बराक ओबामा ने आइएस के खात्मे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन इसकी सफलता को लेकर बहस की काफी गुंजाइश है। आइएस की अपील तमाम देशों की सीमाओं और महाद्वीपों तक पहुंच रही है। दो अमेरिकी नागरिकों का सिर कलम करने वाला आइएस आतंकवादी जिसकी बातचीत ब्रिटिश भाषा शैली से मेल खाती है, इसका प्रमाण है। उसने तमाम युवा ब्रिटिश नागरिकों का ध्यान आकर्षित किया है और ये इस उग्र समूह से जुड़ना चाहते हैं। सच्चाई यही है कि इस्लाम में आस्था रखने वाली कुछ युवा ब्रिटिश लड़कियों ने भी इस विचारधारा से प्रभावित होकर आइएस की सदस्यता ग्रहण की है। वे मानवबम बनने को तैयार हैं। इससे लंदन के सुरक्षा अधिकारीं गहरी चिंता में डूब गए हैं। दो अमेरिकी नागरिकों का सिर कलम किए जाने के बाद आइएस को केवल अमेरिका के लिए खतरे के तौर पर नहीं देखा जा सकता। प्रतीक के तौर पर सिर कलम किए जाने की घटना का वीडियो जारी करने का तरीका तथा दुनिया भर में उसका संक्रामक असर और प्रसार गुआंतनामो खाड़ी की याद दिलाता है, जहां 9/11 की घटना के बाद संदिग्ध मुसलमानों को कैद कर रखा गया था। बराक ओबामा को व्यक्तिगत चुनौती इसी का एक हिस्सा है कि आइएस खुद की पहचान राष्ट्रों के ऊपर सुपर खलीफा के रूप में बनाना चाहता है। तमाम कटु आलोचनाओं के बाद भी ओबामा ने आइएस के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठाए हैं। सीरिया से लेकर ईरान तक की जटिल भू-राजनीतिक स्थिति और पश्चिम एशियाई राजनीति की गुत्थी के साथ-साथ अरब क्त्रांति के बाद सुन्नी-शिया संप्रदायों में गहरे विभाजन ने नीति विकल्प के तौर पर व्हाइट हाउस के लिए तमाम मुश्किलें पैदा कर दी हैं। 9/11 की वर्षगांठ से पहले अलकायदा प्रमुख जवाहिरी ने एक वीडियो जारी करके भारत और कश्मीर का भी खास तौर पर अपने अभियान के लिए उल्लेख किया। इसके मद्देनजर भारत को चरमपंथी जिहादी विचारधारा और राज्य संचालित आतंकवाद को गंभीरता से लेना होगा। 1990 की गरमियों और विवादित ढांचा ध्वंस के बाद 1993 में मुंबई आतंकी हमले ने एक दुखद अध्याय की शुरुआत की। इसमें दिसंबर 1999 में कंधार घटना, दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर आतंकी हमला और नवंबर 2008 में मुंबई पर आतंकी हमला शामिल हैं। यह बताता है कि दुनिया जब नई सहस्त्राब्दि में प्रवेश कर रही थी तो भारत के पास भी तालिबान के खिलाफ किसी पुख्ता नीति अथवा रणनीति का अभाव था। प्रधानमंत्री वाजपेयी के नेतृत्व वाली भारत सरकार को तब अपहृत विमान नागरिकों को छुड़ाने के लिए आतंकवादियों से समझौता करना पड़ा। वर्तमान परिस्थितियों में आइएस के खिलाफ कार्रवाई के मामले में बीजिंग और मॉस्को ने ठंडा रुख अपना रखा है, जो विश्व के लिए ठीक नहीं। दुनिया के कुछ देश तभी खड़े होते हैं जब उनके नागरिकों का सिर कलम किया जाता है। भारत में भी दो दशक से छद्म युद्ध चल रहा है। आज आंतरिक और वाह्य सुरक्षा जटिल रूप में एकदूसरे से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में कुछ देशों में फैल रही खतरनाक जिहादी विचारधारा को रोकना मोदी सरकार के लिए भी एक चुनौती है।
[लेखक सी उदयभास्कर, सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]
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आतंक का सही जवाब

Wed, 10 Sep 2014

भारत के खिलाफ जारी आतंकवाद पाकिस्तान सरकार की तरफ से चलाया जा रहा जिहाद है। भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को बल देने के लिए पाकिस्तान की बदनाम संस्था आइएसआइ नए-नए तरह के हथियारों और तौर-तरीकों को लेकर दिशानिर्देश देती है। इस परिप्रेक्ष्य में क्या आइएसआइ अब अलकायदा के मार दिए गए सरगना ओसामा बिन लादेन के पूर्व सहयोगी अयमान जवाहिरी का उपयोग कर रही है? इस क्त्रम में जवाहिरी ने एक वीडियोटेप संदेश जारी किया है, जिसमें उसने अलकायदा की भारतीय शाखा के गठन की घोषणा की है। इस टेप से पाकिस्तान की असलियत भी एक बार फिर सामने आ गई है। जैसा कि अमेरिकी अधिकारी भी बार-बार कहते रहते रहे हैं कि जवाहिरी पाकिस्तान में छुपा हुआ है, इस टेप से इस हकीकत पर मुहर लग गई है। सार्वजनिक किए गए 55 मिनट के वीडियो में जवाहिरी ने भारत भर में आतंकवादी हमलों की धमकी दी है और यह भी कहा है कि वह किसी पहाड़ी गुफा में नहीं छिपा हुआ है, बल्कि पाकिस्तान की धरती पर है और उसे आइएसआइ का पूरा संरक्षण हासिल है। जवाहिरी आइएसआइ की मुख्य धारा के संगठन लश्करे तैयबा और उसके संस्थापक हाफिज सईद से काफी नजदीकी रखता है, जो भारत के खिलाफ आतंकवाद छेड़े हुए है। भारत में खूनखराबा के लिए आइएसआइ लगातार लश्करे तैयबा को आगे रखती है। नवंबर 2008 में तीन दिन तक चले आतंकवादी हमले में लश्कर का ही हाथ था, जिसमें तकरीबन 166 लोग मारे गए थे। इसका एक और प्रमाण मई में ठीक उस समय सामने आया जब प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी शपथ लेने वाले थे। उस समय भारी हथियारों के साथ पश्चिमी अफगानिस्तान के मुख्य शहर में स्थित भारतीय वाणिज्यदूतावास पर आतंकवादी हमला किया गया। विफल रहे इस हमले को लेकर अमेरिका ने लश्करे तैयबा पर आरोप लगाया और कहा कि उसका इरादा भारतीय राजनयिकों को बंधक बनाना था ताकि मोदी के पदभार ग्रहण के समय बाधा उपस्थित की जा सके। मई 2011 में पाकिस्तान के सैन्य इलाके एबाटाबाद में एक विशालकाय कोठी में रह रहे ओसामा बिन लादेन के अमेरिका के विशेष बलों के हाथों मारे जाने से पूर्व तक पाकिस्तानी सेना और वहां की आइएसआइ के लोग लगातार इन्कार कर रहे थे कि उन्हें लादेन के बारे में कोई भी जानकारी है। तकरीबन एक दशक तक लादेन को पाकिस्तान के सुरक्षा प्रतिष्ठान की तरफ से वीआइपी सुरक्षा दी जाती रही ताकि उसे अमेरिका के खुफिया तंत्र से छुपाए और बचाए रखा जा सके। सच्चाई यही है कि लादेन की शरणगाह पाकिस्तान-अफगानिस्तान की सीमा के पास नहीं, बल्कि पाकिस्तान की मुख्य भूमि में पाई गई जहां पूर्व में अलकायदा के तमाम अन्य आतंकियों को रखा गया था। इनमें अलकायदा का तीसरा मुख्य कमांड प्रमुख खालिद शेख मोहम्मद, अलकायदा का नेटवर्क संचालन प्रमुख अबू जुबैदा, यासर जजीरी, अबू फराज फर्ज और रम्जी बिनाल शामिल थे। इसी तरह जारी किए गए हालिया वीडियो से भी पता चलता है कि जवाहिरी भी पाकिस्तान-अफगानिस्तान की सीमा के पास किसी पहाड़ी गुफा में नहीं, बल्कि पाकिस्तान के मुख्य स्थान में रह रहा है। आइएसआइ स्पष्ट तौर पर एक आतंकवादी संगठन है। आइएसआइ की एस शाखा भारत और पाकिस्तान में आतंकी गतिविधियों को सहयोग और प्रोत्साहन देने का काम करती है। यही शाखा लश्करे तैयबा, जलालुद्दीन हक्कानी नेटवर्क ओर दूसरे अन्य आतंकी समूहों को नियंत्रित करने का काम करती है। बावजूद इसके अमेरिका इस शाखा पर प्रतिबंध लगाने से हिचक रहा है। सीमा पार आतंकवाद को फैलाने में लगे इसके प्रमुख अधिकारियों पर शिकंजा न कसने के कारण भारत के लिए खतरा बढ़ रहा है। इसके बजाय वाशिंगटन पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया संस्था आइएसआइ को कई अरब डॉलर की लगातर मदद मुहैया करा रहा है। वास्तव में अमेरिका की विफल पाकिस्तान नीति ने इसे दुनिया के लिए टेररिस्तान अथवा आतंकवादी देश के तौर पर निर्मित करने का काम किया है। यहां नागरिक संस्थाओं को मजबूत करने के बजाय अमेरिका ने पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान में घुस आए जिहादियों को संरक्षण देने का काम किया है। तानाशाह परवेज मुशर्रफ के जाने के बाद पाकिस्तान की नई नागरिक सरकार ने आइएसआइ को आंतरिक गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करने को कहा है। नागरिक नियंत्रण के इन प्रयासों से सेना निराश है और अब पाक सेना तथा आइएसआइ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ सरकार को अस्थिर करने में लगी हुई है। जवाहिरी का वीडियो संदेश पाकिस्तान की तरफ से युद्धविराम उल्लंघन की दिशा में कदम है और यह इस बात का संकेत है कि आइएसआइ भारत में नए हमलों की योजना बना रही है। किसी भी बड़ी आतंकवादी वारदात से भारत-पाकिस्तान संबंधों पर गंभीर असर पड़ेगा और मोदी सरकार पर समुचित जवाब देने के लिए दबाव अत्यधिक बढ़ जाएगा। मोदी द्वारा दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद करने के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक शक्ति संघर्घ तेज हो गया, जिसे देखते हुए चीन के राष्ट्रपति ने भी वहां जाने के कार्यक्त्रम को रद कर दिया। ऐसा पहली बार होगा जब कोई चीनी नेता भारत आएगा, लेकिन पाकिस्तान नहीं जाएगा। क्या ऐसे समय में भारत के लिए इस्लामाबाद के साथ कोई सार्थक वार्ता संभव होगी। नवाज शरीफ घरेलू राजनीति में एक कमजोर व्यक्ति के तौर पर उभर आए हैं। पाक सेना बिना किसी तख्तापलट के फिर से ड्राइविंग सीट पर है। ऐसे में भारत में सीमा पार आतंकवाद की घटनाओं में बढ़ोतरी होनी तय है। बहरहाल आतंकवाद की बुराई को पाकिस्तान में शराब पीने वाली पीढ़ी के बजाय मुल्लाओं द्वारा अधिक समर्थन-सहयोग दिया जा रहा है। यह अलग तरह के सेक्युलर जनरल हैं जो जिहादी ताकतों को बढ़ा रहे हैं। पाकिस्तान सेना और आइएसआइ में सुधार के बिना सीमा पार आतंकवाद खत्म नहीं होने वाला या कहें पाकिस्तान में राष्ट्रनिर्माण का काम शुरू नहीं हो सकता। भारत में आतंकवादी खतरे की दृष्टि से पाकिस्तान अभी भी ग्राउंड जीरो बना हुआ है और दुनिया के अन्य देशों के लिए भी खतरा है। मोदी सरकार को चाहिए कि यदि भारत पर बड़ा आतंकवादी हमला किया जाता है तो वह पाकिस्तान सेना को कठोर जवाब देने के लिए एक आपात योजना तैयार करे। किसी देश की प्रतिकूल स्थितियों में प्रतिरोध की क्षमता ही उसे किसी अन्य देश द्वारा किसी भी प्रकार के हमले, जिसमें आतंकवादी हमला से लेकर किसी सैनिक का सिर कलम करने जैसी बातें भी शामिल हैं, का प्रतिरोध किया जा सकता है। इस उपमहाद्वीप में शांति तभी कायम की जा सकती है जब भारत इस वास्तविकता को स्वीकार करे कि वह किसी भी गैर परंपरागत युद्ध के लिए तैयार है अथवा उसका सामना कर सकता है। समुचित जवाब देने की क्षमता पर ही ऐसे किसी हमले को रोका जा सकेगा। इसमें शत्रु की जमीन पर युद्ध भी शामिल है।
[लेखक ब्रह्मा चेलानी, सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]
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अपनी हदों को पार करते जिहादी

25, OCT, 2014, SATURDAY 10:56:47 PM

एल.एस.हरदेनिया
इस समय दुनिया के अनेक मुस्लिम बहुल देशों में बड़े पैमाने पर खूनखराबा हो रहा है। अनेक आतंकवादी समूह जो अपने आप को जिहादी कहते हैं इस्लाम के नाम पर अनेक ऐसी बर्बर हरकतें कर रहे हैं जिनके बारे में देखकर और सुनकर यह नहीं कहा जा सकता कि यह सब 21वीं सदी में हो रहा है।
इसी तरह की दानवी गतिविधियों की श्रंृखला में एक ओर दिल दहला देने वाला समाचार आया है। इस समय ईराक में दो मुस्लिम गुटों के बीच में भयंकर खूनखराबा हो रहा है। इन दो गुटों में से एक है इस्लामिक स्टेट जिहादी गुट। इस गुट ने अपने विरोधियों की अनेक महिलाओं और बच्चों पर कब्जा किया है। इस्लामिक स्टेट जिहादियों ने यह फैसला किया है कि वे ईराक की धरती से यजीदियों का नामोनिशान मिटा देंगे। अपने इस इरादे को अमलीजामा पहनाने के लिए ये हर प्रकार की हदों को पार कर रहे हैं। यजीदी ईराक में रहने वाली ऐसी कौम है जो विभिन्न धर्मों पर आधारित आस्थाओं में विश्वास करती है और मूर्ति पूजा में भी विश्वास करती है। इन जिहादियों का यजीदियों के अतिरिक्त कुर्दों से भी संघर्ष हो रहा है। जिहादियों का कहना है कि यजीदी जैसा धार्मिक समूह ईराक में कैसे रह सकता है। यजीदियों पर लगातार पिछले दिनों से हिंसक हमले हो रहे हैं। वे इस हद तक आतंकित हैं कि उनमें से अनेक दूरदराज के जंगलों और पहाड़ों में छिपे हुए हैं।
जिहादियों ने अपने खूनी अभियान के अंतर्गत अनेक यजीदी माताओं, बहनों और बच्चों का अपहरण किया है। उनकी मान्यता है कि अपनी लूट के दौरान उन्होंने जो कुछ भी पाया है उस पर उनका कब्जा है चाहे वह पैसे हों, अन्य प्रकार की संपत्ति हो उस सब पर उनके बहादुर योद्धाओं का अधिकार है। वे लूट में पाई गई अन्य चीजों का बंटवारा कर रहे हैं वहीं वे उनके हाथ लगी महिलाओं और बच्चों का भी बंटवारा कर रहे हैं। जितना बहादुर जिहादी है उसे उतनी ही बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे दिए जा रहे हैं। इन तथाकथित बहादुरों को यह अधिकार है कि वे इन महिलाओं के साथ जैसा चाहे व्यवहार करें। वे उन्हें गुलामों की तरह भी रख सकते हैं। इस तरह जो गुलामीप्रथा कई वर्षों पहले समाप्त हो चुकी थी उसे पुन: जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है।
इस्लामिक स्टेट की अधिकृत पत्रिका जिसका नाम है  'दबिकÓ। पिछले रविवार को प्रकाशित 'दबिकÓ के संस्करण में यह स्पष्ट रूप से छापा गया है कि ये जिहादी न सिर्फ विजयी लोगों को बतौर ईनाम के महिलाएं और बच्चे सौंप रहे हैं, बल्कि वे उन्हें बेच भी रहे हैं। यजीदी ईराक के उत्तरी भाग में रहते हैं। परंतु पिछले चार महीनों से लगातार उनके ऊपर हमले हो रहे हैं। जिहादियों द्वारा किए गए इन हमलों में बड़ी संख्या में यजीदी मारे गए हैं। इसके साथ ही हजारों की संख्या में उन्हें उन स्थानों से भगा दिया गया है जहां वे वर्षों से रह रहे हैं। इन्हें बहुत पहले जिहादियों ने चेतावनी दे दी थी कि वे उनका कत्लेआम करेंगे और उनमें से एक को भी जिंदा नहीं छोड़ेंगे। इस पत्रिका में एक लेख छपा है जिसका शीर्षक है 'गुलामी प्रथा की पुनस्र्थापनाÓ। पत्रिका में यह तर्क दिया गया है कि उनकी कार्रवाई के दौरान वे एक ऐसी प्रथा की पुनस्र्थापना कर रहे हैं जिसे 'शरियाÓ (इस्लामिक कानून) में मान्यता प्राप्त है। पत्रिका में बताया गया है कि शरिया के अनुसार पकड़ी गई महिलाओं और बच्चों का बंटवारा हो रहा है। जो जितना बड़ा बहादुर है और जिसने ज्यादा से ज्यादा यजीदियों को मारा है उसे पकड़ी गई महिलाओं और बच्चों का बड़ा हिस्सा दिया जाएगा।
वर्षों पहले शरिया में व्याप्त यह पद्धति समाप्त कर दी गई थी परंतु अब उसे फिर से जिंदा किया जा रहा है। लिखित इतिहास में इस तरह के बंटवारे का उदाहरण फिलीपाइन और नाइजीरिया में पाया जाता था जहां ईसाई महिलाओं और बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार किया गया था। इस नरसंहार और दानवी हरकत को कोई भी प्रतिबंधित नहीं कर पा रहा है।
इस बीच यह भी खबर आई है कि ईराक में रहने वाला एक और मुस्लिम समाज जिसे कुर्द कहते हैं इन जिहादियों का बड़ी दमखम से मुकाबला कर रहा है। जिहादियों के विरुद्ध सारी दुनिया में प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रभावित समूहों के प्रतिनिधि विश्व के सभी विकसित राष्ट्रों से सहायता की मांग कर रहे हैं।
यह सभी को ज्ञात है कि इस तरह की हिंसा पर दुनिया के सभी देशों की (जिन्हें मुस्लिम राष्ट्र भी शामिल हों) एकता से नियंत्रित किया जा सकता है। इस बीच अमेरिका के अनेक युद्ध हवाई जहाज इस्लामिक स्टेट के फौजी अड्डों पर हमला कर रहे हैं। पिछले दो दिनों में अमेरिकी हवाई जहाजों ने नौ हमले किए गए हैं। इनसे जिहादियों के हौसले कुछ हद तक पस्त हुए हैं। परंतु अकेले अमेरिका द्वारा की गई कार्रवाई से स्थिति नियंत्रण में नहीं आयेगी।
 अनेक देशों से यह खबर आ रही है कि वहां के युवक इस्लामिक स्टेट नामक संगठन में शामिल हो रहे हैं। इंग्लैण्ड और अमेरिका में रहने वाले नौजवान भी इस खूंखार संगठन में शामिल हो रहे हैं। इस खबर से कि उनके देश के मुस्लिम नागरिक जिहादियों की फौज में शामिल हो गए हैं अमेरिका और इंग्लैण्ड में सनसनी फैल गई है। इस बीच जिहादियों ने कोबाने नाम के एक शहर पर कब्जा कर लिया है। इस शहर से जिहादियों का कब्जा हटाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास जारी हैं। कोबाने एक ऐसा शहर है जिसमें बड़ी संख्या में कुर्द रहते हैं। अनेक लोगों की यह शिकायत है कि इस शहर को जिहादियों से बचाने के लिए तुर्की को जितनी मदद करनी थी, नहीं की।
इस बीच दो ऐसी घटनाएं हुईं हैं जिनसे मुस्लिम बहुल राष्ट्रों का एक दूसरा चेहरा भी सामने आया है। पाकिस्तान की बहादुर बेटी मलाला को नोबल पुरस्कार मिला है। मलाला दुनियाभर में बच्चियों की शिक्षा के अधिकार की प्रतीक बन गई है। उसके ऊपर दो वर्ष पहले तालिबानियों ने कातिलाना हमला किया था। क्योंकि वह सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर रही थी कि बच्चियों को पढऩे का हक है। परंतु यह दु:ख की बात है कि नोबल पुरस्कार मिलने पर सारी दुनिया में जश्न मनाया गया परंतु पाकिस्तान के अनेक लोगों ने मलाला की आलोचना की और यह आरोप लगाया कि वह काफिरों के हाथ का खिलौना बन गई है।
इस बीच खालिद एहमद, जो पाकिस्तान के एक जाने माने प्रतिष्ठित पत्रकार और पाकिस्तान के प्रभावशाली समाचार पत्र न्यूज वीक पाकिस्तान के परामर्शदाता संपादक भी हैं, ने इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख में कहा है कि मलाला को भले ही नोबल पुरस्कार मिल गया हो लेकिन वह आज भी पाकिस्तान में प्रवेश नहीं कर सकती।
पाकिस्तान में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो अत्यधिक भद्दी भाषा में मलाला के बारे में बातें कर रहे हैं। खालिद एहमद लिखते हैं कि वैसे तो बड़ी संख्या में पाकिस्तानियों ने मलाला को नोबल पुरस्कार मिलने पर प्रसन्नता जाहिर की परंतु ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जिन्होंने मलाला को अमेरिका का पिट्ठू न बताया हो। इस तरह के लोग मानते हैं कि मलाला इस्लाम विरोधी ताकतों के हाथों में खेल रही है।  इस तरह के प्रतिक्रियावादी लोग कुछ भी कहें पर पाकिस्तान के युवकों और युवतियों के लिए मलाला प्रेरणा की स्रोत है। अभी हाल की मेरी स्वयं की पाकिस्तान की यात्रा के दौरान मैंने अनुभव किया था कि पाकिस्तान के युवक-युवतियां वैसी ही आजादी चाहते हैं जिसके लिए मलाला ने अपनी जान जोखिम में डाली।
इस्लामिक दुनिया से एक और अच्छी खबर आई है। यह खबर आई है सऊदी अरब से। जहां महिलाओं पर किसी भी प्रकार का वाहन चलाना प्रतिबंधित है। एक खबर में यह दावा किया गया है कि दुनिया में सऊदी अरब ही एक ऐसा देश है जहां औरतें ड्रायविंग सीट पर नहीं बैठ सकतीं। वहां वाहन चलाने के अधिकार को प्राप्त करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। अभी बीच में यह अभियान ठंडा पड़ गया था परंतु अब पुन: बड़े पैमाने पर उसे फिर से चालू किया जा रहा है। सऊदी अरब के सोशल मीडिया पर रोज ऐसे चित्र आ रहे हैं जिनमें महिलाएं किसी न किसी वाहन को चलाते हुए दिखाई जाती हैं। जो लोग अभियान चला रहे हैं उनका दावा है कि किसी को भी यह अधिकार नहीं कि वे आधी आबादी को इस तरह दबाएं। इन लोगों का दावा है कि कम से कम इस्लाम का सहारा लेकर इस तरह का प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से अनुचित है। आशा है कि और मुस्लिम बहुल देशों से भी इसी तरह की खबरें सुनने और पढऩे को मिलेंगी।
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